साहित्य

आदित्य मृत्यु होना निश्चित है

डा० कर्नल आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’, ‘विद्या वाचस्पति’

मन के अंदर संघर्ष-द्वन्द्व पर चेहरे
पर छायी रहती है मुस्कान मधुर,
जीवन जीने का सरल सहज पथ,
जीवन रंगमंच का श्रेष्ठ अभिनय रथ।

मानव जीवन तो क्षण भंगुर है,
कड़ी सुरक्षा भी तो बेमानी है,
धन दौलत सब यहीं रह जाते हैं,
जब प्राण – पखेरू उड़ जाते हैं।

बड़े बड़े राजे महाराजों को और
देखा बड़े से बड़े तानाशाहों को,
जब आन पड़ी उनके जीवन पर तो
रुक न सके दुनिया में रह पाने को।

लाखों और करोड़ों का हक़ छीने
आगे पीछे लाव लश्कर लगवाने में,
जब अंत समय आया तो कुछ न
कर सके जीवित ही मारे जाने में।

अपनों ने ही गोलियों से भून दिया,
वे ज़िम्मेदार सुरक्षा करने वाले थे,
माता पिता पुत्र पुत्री सब अपने और
पराये भी, सब हो जाते हैं बेगाने से।

इतनी कड़ी सुरक्षा में भी इनका है
जीवन शंका व भय से भरा हुआ,
जननायक कहलाते हैं यह सब,
पर जनता से पूरा नाता कटा हुआ।

गांधी को भी तो गोली मारी थी,
जिन हाथों का मिला सहारा था,
आदित्य मृत्यु होना निश्चित है,
जन्म लेकर जीना बस नश्वर था।

डा० कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्या वाचस्पति’
लखनऊ

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