
ख़्वाब में आना भी नहीं मुमकिन
वक्त ही नहीं है मेरे महबूब के पास!!
सिकुड़ता जा रहा है रिश्तो का दायरा
क्या सिर्फ़ फ़ासिले ही है गुनहगार!!
निभा नहीं सकते तो बनाते क्यों हो
मृगतृष्णा की तरह है रिश्ते आसपास!!
वह हिफ़ाज़त क्या करेंगे मेरे दिल की
फ़ज़ीहत ही बढ़ेगी इससे जनाब!!
आपको दूरियों का एहसास नहीं है
चंद तन्हा है आपके आसपास!!
भुलाकर रख चुके हैं रिश्ते सारे
कोई नहीं आएगा अब हमारे पास!!
वादा-ख़िलाफ़ी जो रोज़ करते हैं
वो शख़्स क्या करेंगे हमारा इंसाफ़!!
कभी हम काम आए कभी वह
यह दुनिया इसी तरह चलती है जनाब!!
दोष किसे दे हम अपनी बर्बादी का
किसी पर उंँगली उठाना भी है गुनाह!!
ग़म से बढ़कर कोई महबूब नहीं
और हम भी हैं यहांँ रोने को बे-क़रार..
स्वरचित- राजीव त्रिपाठी
उदयपुर राजस्थान




