साहित्य

पैसा

नीलम अग्रवाल रत्न

पैसा छलता जीव को,भर देता अभिमान।
बैर कराता है कहीं, कहीं दिलाता मान।।
देख पैसे की माया।
पलटता पल में काया।।

अपनों को भी मारते,पैसे खातिर लोग।
अपनापन मरता गया,ये कैसा है भोग।।
अकेले जीवन कैसा।
काम नहीं आता पैसा।।

रिश्ते नाते सब यहांँ,पैसे का है खेल।
कलयुग में पैसे बिना,चले न जीवन रेल।।
घोर कलयुग है आया।
पाप का जाल बिछाया।।

अपनों को तू छोड़ मत,पैसे खातिर आज।
रिश्ते सब अनमोल हैं, इन पर करना नाज।।
बचा ले रिश्ते नाते।
काम अपने ही आते।।

राम नाम अनमोल है,फिर भी बिकता रोज।
पंडित भी बिकते यहां, करें सेठ की खोज।।
ढोंग करते हैं पंडे।
ज्ञान को पड़ते डंडे।।

नीलम अग्रवाल रत्न बैंगलोर
🙏🙏

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!