साहित्य

बे सुहाने मौसम

डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण

बे सुहाने मौसम खिलखिलाने लगे।
बसंत आया फिर मुस्कुराने लगे।
शीत कम हुआ गुनगुनी सी धूप।
बदलने लगा कुदरत का रूप।।

कोयल आम्र पे गूंज रही है देखो।
सरसों पीली शोभित लगती देखो।
कंचन सी धरती देखो लग रही।
अलि गुंजन कानों में रस घोल रही।

पलाश सुर्ख़ आग की लपटें लगें।
अरमानों की सुंदर डोरी से बॅंधी।
रति अनंग खिलता मधुमास है।
प्रकृति छटा रुचिकर अब बनीं।।

पतझड़ के पत्ते झर पेड़ उदास हैं।
बसंत उमंग लिए कोपलें उल्लासित है।
फूलों की महक बह रही चहुँ ओर है।
मादक हुई प्रकृति घटा घनघोर है।।

बे सुहाने मौसम दिल को लुभाने लगे।
उदासियाँ दूर हुईं जन्नत सा जमाना लगे।
प्रीत डोर की बॅध गई है जब कान्हा से।
उपवन में देखो राधा संग कान्हा डोल रहे।।

डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण
छतरपुर मध्यप्रदेश

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