
इक्कीस दिनों में शहर से सपने गुम हो रहे हैं,
आँकड़ों में दर्ज होकर अपने कम हो रहे हैं।
सैलाब में इस भीड़ के,पहचान बिखर गई,
दिल्ली में इंसान ही जैसे कम हो रहे हैं।
हर सुबह अख़बार किसी घर को रुला जाता है,
आँखों में किसी मां के आँसू नम हो रहे हैं।
काग़ज़ कहें कुछ लोग मिल गए शहर में,
पर न मिलने वाले सवाल बन हो रहे हैं।
स्कूल कहें पहचान-पत्र साथ लाना ज़रूरी है,
पर जिनकी पहचान खो गई, वो घर रो रहे हैं।
पुलिस कहे जांच जारी है पूरी गंभीरता से,
पर घरों के चूल्हे फिर भी थम हो रहे हैं।
ये सिर्फ़ संख्या नहीं, ये रिश्तों की हार है,
हर अंक के पीछे सैकड़ों ग़म हो रहे हैं।
राजधानी पूछ रही है ख़ुद से चुपचाप,
क्या हम सच में सुरक्षित हम हो रहे हैं?
राजधानी है यह,पर सवाल बड़ा हो जाएगा,
सुरक्षा का दावा, पर अब खोखला हो जाएगा।
हर चेहरा लौटकर, जब तक घर नहीं आएगा,
“सुरक्षित राजधानी” सिर्फ़ नारा कहलाएगा।
दिनेश पाल सिंह, ‘दिव्य’
जनपद संभल उत्तर प्रदेश




