साहित्य

बसंत

मंजुला शरण मनु

देखो आ गया है बसंत ।
दूर हो गयी धरती की,
वो ठंढ़ी उदास सांस ।
धरती ने सज धज कर ,
कर लिया है नव ॠंगार ।
सरसों की पीली चुनरी पर
तीसी ने नीले बूटे काढ़
कर धरती को ओढ़ा दियाहै।
सुनो, गूँज रही है
भौंरों की शहनाई,
पुरवाई है थोड़ी अलसाई।
कोयल तान सुना कर ,
बाँट रही है न्यौता।
पलाश की लाल कलंगी से
बसंत ने सजाया है सेहरा ।
पीछे है सेमल
सहबाले का चेहरा।
प्रथम मिलन की
मादक गंध लिए ,
अमराई भी ड़ोल रही ।
बेला और चमेली भी,
अपनी आँखें खोल रहीं।
झूमर नाच रही हैं तितलियाँ।
झूम रही गेहूँ की बालियाँ।
ले आया है बसंत
चना मटर की बारात।
धरती के आँचल में होगी
अन-धन की सौगात।
आते हैं भोले शंकर भी
एनीर्सरी मनाने,
माँ पार्वती को लेकर साथ।
धरती और बसंत का मिलन।
शिव- शक्ति का महामिलन,
अतुलित और अनंत,
देखो आ गया बसंत ।

मंजुला शरण मनु
राँची, झारखण्ड़।

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