
जब साँझ की खिड़कियों पर
अँधेरा धीरे-धीरे उतरता है,
तब दिन अपनी थकान समेट
सबसे चुपचाप विदा लेता है।
जब खिड़की के पास बैठी मैं
समय को उबलते देखती हूँ,
गर्म चाय की उठती भाप में तेरी
यादों की परछाईं खोजती हूँ।
चाय के हर घूँट पीने के साथ,
कई बीती स्मृतियाँ याद आती हैं,
कभी कभी शक्कर नहीं डालती मैं,
फिर भी मिठास सी घुल जाती है।
जाती धूप के आख़िरी किरणें,
कप की दीवारों से टकराकर,
मेरी हथेलियों तक तेरी यादों की,
जानी पहचानी ऊष्मा पहुँचा देते हैं।
जब कमरे की नितांत ख़ामोशी में,
तेरा नाम धीरे से खनकता है,
तब मेरा अकेलापन चुपचाप
अपने को,अपनेआप को समेट लेता है।
दूरियाँ में कोई दीवार नहीं रहती,
जब बीती यादें साँस लेने लगती हैं,
और जाती सिंदूरी साँझ मेरे चेहरे पर
तेरे स्पर्श का एहसास जताने लगती है।
और तेरी झलक,मेरी आँखों में,
ठहर जाए अगर कुछ पल के लिए
बिना किये किसी की परवाह
चाय की आख़िरी चुस्की की तरह।
सुमन बिष्ट, नोएडा



