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दिल्ली में गुम होते लोग : आंकड़ों के पीछे छिपी भयावह सच्चाई

दिनेश पाल सिंह 'दिव्य'

दिल्ली में गुम होते लोग : आंकड़ों के पीछे छिपी भयावह सच्चाई
देश की राजधानी दिल्ली एक बार फिर चिंता के केंद्र में है। ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि महज़ 21 दिनों के भीतर 1472 लोग लापता हो गए। दिल्ली पुलिस के जिपनेट के अनुसार, 15 जनवरी 2026 तक जहां 997 गुमशुदगी की शिकायतें दर्ज थीं, वहीं 5 फरवरी 2026 तक यह संख्या बढ़कर 2469 तक पहुंच गई। इसका अर्थ है कि राजधानी में प्रतिदिन औसतन लगभग 70 लोग लापता हो रहे हैं।
ये आंकड़े केवल प्रशासनिक रिपोर्ट नहीं हैं, बल्कि हर संख्या के पीछे किसी परिवार की टूटती उम्मीद, किसी मां की सूनी आंखें और किसी बच्चे का अधूरा इंतज़ार छिपा है। स्थिति की गंभीरता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि स्कूलों को अभिभावकों के लिए पहचान पत्र अनिवार्य करने जैसे निर्देश जारी करने पड़े हैं।
हालांकि पुलिस का दावा है कि सभी मामलों की गंभीरता से जांच की जा रही है और अब तक 446 लोगों का पता लगाया जा चुका है, साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि जनवरी 2026 में पिछले वर्षों की तुलना में गुमशुदगी के मामलों में कमी आई है। किंतु सवाल यह है कि जब हर दिन दर्जनों लोग लापता हो रहे हों, तब राहत के ये दावे कितने पर्याप्त हैं?
राजधानी जैसे महानगर में लोगों का यूं गुम हो जाना न केवल कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है, बल्कि सामाजिक सुरक्षा, निगरानी तंत्र और मानवीय संवेदनाओं की भी परीक्षा लेता है। आवश्यकता है कि इन मामलों को सिर्फ आंकड़ों की तरह न देखा जाए, बल्कि मानवीय त्रासदी के रूप में समझते हुए ठोस और त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
जब तक हर गुमशुदा सुरक्षित घर न लौटे, तब तक यह कहना कठिन है कि राजधानी वास्तव में सुरक्षित है।राजधानी है यह—पर सवाल बड़ा हो गया,
सुरक्षा का दावा क्यों खोखला हो गया?

इकिस दिनों में चौदह सौ चेहरे गुम,
यह विकास है साहब या व्यवस्था का भ्रम?

हर दिन सत्तर लोग शहर निगल जाता है,
फिर भी सिस्टम कहता है,सब संभल जाता है!

काग़ज़ बोले,मामले दर्ज हो रहे हैं,
पर घर वाले,अपनो को खो रहे हैं।

पहचान पत्र बच्चों के लिए ज़रूरी है,
तो इंसान का गुम होना क्यों मजबूरी है?

चार सौ मिले,यह राहत की बात कही गई,
बाक़ी की पीड़ा किस फ़ाइल में दबी गई?

दिल्ली सिर्फ़ राजधानी नहीं, ज़िम्मेदारी है,
लापता लोग नहीं,यह मानव त्रासदी है।

जब तक हर चेहरा लौटकर घर नहीं आएगा,
तब तक “सुरक्षित राजधानी” सिर्फ़ नारा कहलाएगा।
दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’

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