आलेख

दुखिया दास कबीर है

वीणा गुप्त

 (ललित निबंध )

जब से होश संभाला है,कबीर को पढ़ा और सुना है। कबीर की यह दोहा भी कई बार सुना है :-

सुखिया सब संसार है,
खावै अरू सोवै ।।
दुःखिया दास कबीर,
जागे अरू रोवै।।

मेरा बालमन कबीर के रोने की कल्पना कर दुःखी हो जाता था। कबीर रो रहा है,क्यों? जब कबीर के जीवन के विषय में पढ़ा, तो पता चला ,अनाथ है बेचारा। किसी विधवा मांँ ने उन्हें लोक- लाज के भय से नन्हें से बच्चे को छोड़ दिया , अब बच्चा रोएगा नहीं, तो क्या करेगा? बाद में यह भी पता चला कि उन्हें  नीरू और नीमा नामक किसी जुलाहा दंपत्ति ने पाला पोसा।
मेरा मन थोड़ा सा खुश हुआ ,यह सोचकर कि अब कबीर नहीं रोएगा,मजे़ में खेलेगा-
कूदेगा। बाद में गुरु रामदास जी का संरक्षण भी मिल गया। उनके प्रति कबीर ने अपार आभार भी प्रकट किया । कबीर उनकी प्रशंसा करते नहीं थकते:-

सब धरती कागद करूँ,
लेखनी सब बनराय।।
सात समुंद की मसि करूँ,
गुरु गुन लिखा न जाय।।

सतगुरु ने ही उन्हें ईश्वर -भक्ति
का मार्ग दिखाया
सतगुरू की महिमा अनंत,
अनंत कीन्ह उपकार।।
लोचन अनंत उघाड़िया ,
अनंत दिखावन हार।।

लेकिन कबीर के दुःख का कारण अब भी समझ नहीं आया। जिसे ईश्वर भक्ति का मार्ग मिल गया हो, उसके पास तो दुख फटक भी नहीं सकता। फिर क्यों वे बार-बार कहते हैं:-
दुखिया दास कबीर है,
जागे अरू रोवै।।
आखिर कबीर को दुःख है काहे का ? मज़े में गृहस्थी चले रही है।बीवी है,दो बच्चे हैं ।छोटा सुखी परिवार है। ताने- बाने पर झीनी झीनी चदरिया भी ध्यान से  बुनी जा रही है। रोजी़- रोटी की कमी नहीं। जिह्वा पर विराजती  सरस्वती अमर काव्य रचना के रूप में मुखरित हो रही है। तो फिर ‘ना काहू से दोस्ती,ना काहू सै वैर’ वाला प्रैक्टिकल दृष्टिकोण लेकर चलने वाला यह  संत आखिर दुःखी क्यों है,यह बात मुझे समझ नहीं आती। ज्यों-ज्यों सुलझाती हूँ,गुत्थी उलझती जाती हूँ। कुछ तो ऐसा अवश्य है,जो कबीर की संतुष्टि को असंतुष्ट कर रहा है।
कबीर के कथन में दो बातें तो पूर्णतः स्पष्ट हैं। पहली कि कबीर जागे हुए हैं,और दूसरी कि वे दुखी हैं। क्या ये दोनों बातें एक दूसरे से जुड़ी हुई नहीं हैं? क्या एक ही लक्ष्य की ओर इंगित नहीं करतीं? आइए,क्रम से विचार करें।
कबीर जागे हुए हैं,अगर जागे न होते तो दुःखी न होते। अज्ञता कई बार वरदान होती है।कबीर सुविज्ञ हैं, इसीलिए दुःखी हैं।’सुखिया संसार’  की भांति  खाते,पीते और सो नहीं सकते। उन्हें भोगवाद से कोई लगाव नहीं। रसना का रस उनके लिए अग्राह्य है ।वे त्याग को  महत्व देते हैं और जानते हैं जीवन की क्षणभंगुरता—
पानी केरा बुदबुदा,
अस मानव की जात।।
देखत ही छिप जाएगा,
ज्यों तारा परभात।।
कबीर इसी क्षणभंगुरता को अमरता में बदलने का मार्ग जान गए हैं। इसीलिए जागे हुए हैं।
लोगों को भी जगाना चाहते हैं, लेकिन लोग सुखोन्माद में डूबे हैं, जागना नहीं चाहते। उनकी यही अज्ञानता कबीर को रूलाती है:-

झूठे सुख को सुख कहें,
मानत हैं मन मोद।।
जगत चबेना काल का,
कछु मुख में,कछु गोद।।

कबीर झूठे सुख,यानि,विषय-
वासना के दास नहीं हो सकते,क्योंकि उन्होंने मन पर संयम कर लिया है,क्योंकि वे अपने ‘ निरगुनिया’ के दास हैं। उन्हें हर जगह अपने लाल की लाली दिखाई देती है।

लाली मेरे लाल की,
जित देखूँ तित लाल।।
लाली देखन मैं चली,
मैं भी हो गई लाल।।
इसी अनूठी आभा से अनुरंजित होने पर भी; मानसरोवर के सुभग जल में डूबने-उतराने पर भी,मुक्ति रूपी मुक्ता चुगने पर भी,उनका हंस क्यों बार-बार उद्ग्रीव और -उत्कंठित हो ,आर्त पुकार लगाता है?
कबीर किसी अन्याय से पीड़ित  होकर तो कतई दुखी नहीं हो सकते।अपना घर फूँक कर,
लुकाठी हाथ में लिए,सरे-बाज़ार चुनौती देता यह दीवाना किसी के डर से तो दुःखी नहीं हो सकता। उनके दबंग और बेलौस व्यक्तित्व के सामने तो हर भय भयभीत हो जाता है । वे न राजा से डरते हैं न प्रजा से, न खुदा से,न खुदाई से ।अपने में  ही रमता यह फक्कड़ जोगी ,आखिर व्यथित क्यों है? क्यों उनकी यह व्यथा-मंदाकिनी उनके संपूर्ण काव्य में अनवरत बहती है—-

साधो देखौ जग बौराना,
साँच कहौ तो मारन धावै,
झूठे जग पतियाना।।
याही विधि हंँसत चलत हैं हम को,
आपु कहावै सयाना।।

कहीं इन्हीं सयाने लोगों का सयानप ही तो  उनके दुःख का कारण नहीं ? कबीर कवि हैं। जन्मजात प्रतिभासंपन्न कवि। उनका मन आहत है समाज के दोगले ,असगंत आचरण से। आहत हैं वे धर्माडंबरों से,गली- सड़ी रूढ़िवादिता से , आहत हैं
पाषाण-पूजन के लिए होती पशु और नरबलि देखकर। मानवता पर धार्मिक संकीर्णता का कसता शिकंजा उन्हें अंदर तक रूला देता है।वे छटपटाते हैं, लोगों को उनकी अज्ञानता पर लताड़ते हैं। उनके न समझने पर, दुःखी हो जाते हैं।

सच ही तो है,  जिस व्यक्ति की चेतना जाग चुकी है,जो अपने-पराए के भेद से मुक्त है,
वह इस संसार में सुखी कैसे रह सकता है?
‘कुसुमादि कोमल,वज्रादपि कठोर’ उनका कवि,सुधारक,
तत्वज्ञानी,भक्त मन बार -बार विगलित होता है।अपने ह्रदय के आलोक का एक-एक कण वह इस जग में छिटका देना चाहते हैं:-
जल में कुंभ,कुंभ में जल है,
भीतर बाहर पानी।।
फूटा कुंभ,जल जलहि समाना ,
यह तत कथयौ ज्ञानी।

लेकिन अज्ञान और अहंकार में चूर यह सयाना संसार उनकी नहीं सुनता; परपीड़ा से कातर हो वे पुकार लगाते हैं—-

सुखिया सब संसार है,
खावै अरू सोवे।।
दुःखिया दास कबीर है,
जागै अरू रोवे।।

काश! कबीर की यह पुकार उन तक पहुँच पाती जो शोषण की नींव पर अपने वैभव की मीनारें चिन रहे हैं। जिनके कान किसी भी  चीत्कार को सुन नहीं पाते,जिन्होंने अधर्म और अनीति को ही अपना जीवन-मूल्य मान लिया है। जो आडंबर को धर्म मान समाज में हिंसा और घृणा का प्रसार कर रहे हैं, अगर ये लोग कबीर की पुकार सुनकर जाग जाते,तो उनका दुःख सदा के लिए मिट जाता।

काश! कबीर का दुःख, सुख में बदल पाता। कितना सुंदर होता तब यह संसार।और तब कबीर का यह पछतावा भी सदा सर्वदा के लिए दूर हो जाता—-

रात गंवाई सोय कर,
दिवस गंवाया खाय।।
हीरा जन्म अमोल है,
कौड़ी बदले जाय।।

उनके मन-प्राण अनंत के अनहद नाद में मग्न हो जाते और मानव- मृग वह कस्तूरी पा लेता ,जिसकी तलाश में वह युगों -युगों से भटक रहा है, यहाँ से वहाँ तक ,काबे से कैलाश तक। इस तलाश के पूरी होते ही कबीर झूम कर गा उठते—-

गगन गरजि बरसै अमिय,
बादल गहर गंभीर।।
चहुँ दिसि दमकै दामिनी ,
भीगै दास कबीर।।

वीणा गुप्त
नई दिल्ली

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