
मास प्रेम का आ गया, झूम रही है डाल।
उपवन महके फूल से ,मग्न हुए गोपाल।।
हवा बहे फाल्गुन में, मादक खुशबू संग।
रह- रह तन को स्पर्श कर ,बहकाए हर अंग।
चुनरी लहराने लगी, गोरी बदली चाल।
उपवन महके फूल से, मग्न हुए गोपाल।।
दृश्य मनोहर भा रहा , धरणी से आकाश।
प्रातः रवि मुस्का रहे, तम का करके नाश।
नदियाँ झर- झर गा रही , छेड़ नवल सुर ताल।
उपवन महके फूल से, मग्न हुए गोपाल।।
बात अलग मधुमास की, गाते जन- जन फाग।
याद गांँव की आ रही, वो मंजीरा राग।
धूल चटाए नित शहर, बुरा हुआ है हाल।
उपवन महके फूल से, मग्न मदन गोपाल।।
बचपन की होली बहुत, होती थी रंगीन।
गोबर कीचड़ भी हमें, जोड़े दो से तीन।
नाता अब बेरंग कर, रोग रहे है पाल।
उपवन महके फूल से, मग्न हुए गोपाल।।
किरण कुमारी ‘वर्तनी’ जमशेदपुर




