साहित्य

अलसभोर में गौरैया

संजय मृदुल

अलसभोर में गौरैया
चहकती हो आंगन में मेरे
इस इंतजार में कि
दरवाजा खुले और
रोटी के टुकड़े डालें कोई
मिट्टी के सकोरे में।
पानी भरे कटोरे में तुम
उछलकूद करती
उस बिटिया की याद दिलाती
जो चली गई बड़ी होकर परदेस
कमाने को रिजक
अपना भविष्य बनाने
तुम कहीं नहीं जाती क्या
अपना घोंसला छोड़कर कभी दूर?
सारा आंगन गूंजता है
आवाज से तुम्हारी जैसे
अम्मा मंत्र पढ़ती पूजा के समय
लयबद्ध तरीके से ध्यानमग्न हो
तुम भी मांगती हो कुछ
अपने ईश्वर से सबके लिए?
ओ गौरैया! तुम्हारा होना
किसी अपने के होने सा है।
©संजय मृदुल
साथिया

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