
नहीं रास्ते खोज सके जो मुझको आये राह दिखाने।
सागर, नदियां, झीलें, झरनें काम न आये प्यास बुझाने।
इतनी प्यास कि जितना पानी इस पानी के क्या है माने,
नही हुआ कल आज करेंगे करते रहते रोज़ बहाने।
चेहरा तो बेनूर हुआ पर आ जाते हैं रोज़ दीवानें,
खोज रहे हैं इनको – उनको मिल जाते कुछ ठौर -ठिकाने।
गीत समय के इतने गाये गाते – गाते बने तराने,
जीवन की ऐसी गतिविधियां जैसे नदियों के हैं मुहाने।
नही ज़िन्दगी जी पाते जो देते हैं ताने पर ताने,
जीवन आशा और निराशा उम्मीदों की ध्वनि पहचानें।
क्या होगा खोने से आखिर जीने के सैकड़ों बहाने,
जीवन के उद्देश्य हों पूरे समय चूक फिर क्या पछताने।
धरती और गगन में छायी फूलों की गरिमा अंजाने,
इस माटी में तिलक हुआ है इसमें ही हैं सब खो जाने।
वाई.वेद प्रकाश
द्वारा विद्या रमण फाउंडेशन
शंकर नगर, मुराई बाग, डलमऊ, रायबरेली उत्तर प्रदेश 229207
9670040890




