
मंजिल मिले न मिले, यह मुकद्दर की बात है,
पर हम कोशिश भी न, करें यह तो गलत बात है।
तमाम उम्र यही एक सबक, याद रखा है मैंने,
गिरना बुरा नहीं गिरे रहना ही बड़ी बात है।
हवाएं लाख मुखालिफ हो तो क्या हुआ ए दोस्त,
चिरागों को जलते रहना ही उनकी बिसात है।
उड़ान भरने का हौसला रख तू अपने पंखों में,
झुक जाएगा एक दिन तेरे आगे यह “आकाश” भी।
मिलेगा फल तुझे तेरी जद्दोजेहद का एक दिन,
अभी तो बस यह संघर्ष की काली रात है।
पंडित मुल्क राज “आकाश”
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश




