साहित्य

ग़ज़ल

चनरेज राम अम्बुज

ये आँखों  का  तेरा  नशा  जानता है।
मेरा दिल  कहाँ  मयक़दा  जानता है।

महज़ तेरी नज़रों से पी करके मदिरा,
मुहब्बत  में  होना  फ़ना  जानता  है।

वफ़ा चाहे कर ले ज़फ़ा चाहे कर तू,
सँभलना यहाँ दिल-जला जानता है।

मुखौटे से चहरा छुपा  लो भले तुम,
हक़ीक़त  तुम्हारी  ख़ुदा  जानता है।

चलो पूछ लो तुम किसी दिलजले से,
वो दर्द-ए-जिगर की दवा  जानता है।

मुसाफ़िर  भले  हारकर  बैठ   जाए,
थकावट  कहाँ   रास्ता   जानता  है।

न मन्दिर न मस्जिद न रब को ही *अम्बुज*,
वो  मयक़श  महज़  मयक़दा  जानता  है।

चनरेज राम अम्बुज

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