साहित्य

ग़ज़ल

वाई. वेद प्रकाश

ग़ज़ल

जब बढ़ी दुश्वारियां तो ज़िन्दगी खतरे में है।
इस विषैले दौर में तो ज़िन्दगी खतरे में है।
फूल की खुशबू कहां कब खो गई,
इस चमन के मालियों से ज़िन्दगी खतरे में है।
प्यार पर पहरा बढ़ा तो छा गई मायूसियां,
भर गई दहशत से ही तो ज़िन्दगी खतरे में है।
आज भी होरी व धनिया यातनाएं सह रहे,
सेठ साहूकारों से ही तो ज़िन्दगी खतरे में है।
साजिशें ही साजिशें हैं जिस तरफ आंखें उठाओ,
इन अचीन्हे हादसों से ज़िन्दगी खतरे में है।
इस कदर बौराई सत्ता जानिएगा दोस्तों,
सच अगर बोले तो समझो ज़िन्दगी खतरे में है

वाई. वेद प्रकाश
द्वारा विद्या रमण फाउंडेशन
शंकर नगर, मुराई बाग, डलमऊ, रायबरेली उत्तर प्रदेश 229207
9670040890

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