
कभी कभी जरा सी हमने मयक़शी कर ली।
इसी तरह ग़मों से थोड़ी दोस्ती कर ली।
चले ही जाते शब-ओ-रोज मयक़शी के लिए,
कभी नगद कभी हमने उधार भी कर ली।
किसी से शिकवा सिकायत भी क्या करूँ लोगों,
तबाह आशिक़ी में हमने जिन्दगी कर ली।
रईसों के घरों में चाँदनी जो क़ैद हुई,
चरागों को जला के हमने रोशनी कर ली।
हमें न मिल सकी अम्बुज बहार-ए-गुलशन तो,
इसी से हमने तो सहरा से दिलवरी कर ली।
चनरेज राम अम्बुज




