साहित्य

ग़ज़ल

वाई.वेद प्रकाश

दिखा रहा जो आसमान को उस दर्पण को चांद मुबारक।
झांक रही जो रोशन किरणें उन किरणों को चांद मुबारक।
जलते-जलते जल जाती है बाती एक दिये के संग,
दिया और बाती की संगत उस संगत को चांद मुबारक।
नश्वरता की इस दुनिया में मिलना- जुलना और बिछड़ना,
पार झरोखे के जो दिखता उस दर्शन को चांद मुबारक।
यादों की सुनसान गली में एक अकेला मन भटके,
सन्नाटे में तन्हा -तन्हा तनहाई को चांद मुबारक।
नव प्रभात की नव बेला में फूलों का फिर से खिलना,
खिलता बचपन इस नव उपवन इस उपवन को चांद मुबारक।

वाई.वेद प्रकाश
द्वारा विद्या रमण फाउंडेशन
शंकर नगर, मुराई बाग, डलमऊ, रायबरेली उत्तर प्रदेश 229207
9670040890

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