
गर जीवन में संहर्ष नही,तो काहे का फिर जीना,
खाना पीना व सो जाना,यहीं तलक का फिर जीना,
जन्मा जीव जगत में जो भी,सबके अमुक काम हैं अपने,
निर्धारित काम किये बिन जीता,तो काहे का फिर जीना।।
किसी विशेष प्रयोजन से प्रभु ने,जन्म दिया भव सागर में
देव स्वर्ग में तरह रहे हैं,आने को इस भव सागर में
इतना उत्तम संयोग जानकर,फिर भी चूक रहे कर्मों से
अंततः यही हैं दुःख पाते करनी का अपना भव सागर में।।
कर्म करो, हों अर्थपूर्ण जो, सार्थक परिणाम उन्हीं से मिलता
अवतरण का तेरे जग का मतलब सिद्ध इसी से फलता
पशुओं से तो अच्छा कर ले,मत भेज उबाकर इनको बाहर,
निश्च्छल मन से बिन भेदभाव,करने से ही फल मिलता।।
अवधेश कुमार श्रीवास्तव उन्नाव उत्तर प्रदेश




