
होली पावन पर्व में ,उड़ते खूब गुलाल।
एक रंग में डूब कर ,बहके बूढ़े -बाल ।।
है प्रतीक सौहार्द का, होली पावन पर्व ।
भेद-भाव को भूलकर, झूम रहे हैं सर्व।।
रंगा हर पथ घर गली, सजनी कहीं उदास ।
बिना पिया के रंग अब, कैसे आए रास।।
सात जन्म का साथ था,
छुड़ा लिए क्यों हाथ ।
आंँसू भरकर नैन में ,
सूना करके माथ।।
बोझिल लगती श्वास अब,भारी लगता पांँव।
जलता तन मन हर घड़ी , नहीं सुहाये छांँव।।
समझे मन की वेदना, यहांँ भला अब कौन।
देह लगे है काठ सम, अधर हुआ है मौन।।
किरण कुमारी ‘वर्तनी’




