
सुर सरिता की धार वेग से, तेरी वीणा से बहती माँ।
चेरी बनकर शब्द प्रतिष्ठा, तेरे पाँवों में रहती माँ।।
ताल गेयता श्रुतियाँ सारी, नित-नित तेरा वंदन करतीं।
छिड़े सुरों की कोमल ध्वनियाँ, सबके उर को चंदन करतीं।।
नाद गूँजते तंत्री से जब, वीणा महिमा शुभ महती माँ।
चेरी बनकर शब्द प्रतिष्ठा, तेरे पाँवों में रहती माँ।।
वाक् शुभ्र हो भाव धवल हो, निर्मलता का उर निवास हो।
मिटे तिमिर जीवन का सारा, मानवता का नित उजास हो।।
मिले सदा आशीष तुम्हारा, हस्त जोड़कर मैं कहती माँ।
चेरी बनकर शब्द प्रतिष्ठा, तेरे पाँवों में रहती माँ।।
डॉ ऋतु अग्रवाल
मेरठ, उत्तर प्रदेश




