
चारु चंचल रश्मियाँ सँग,
गुनगुनाती चांदनी,
दुग्ध जैसी धवल सी,
वो मुस्कुराती चांदनी।
सज गई धरणी धवल,
तारे भी मतवारे हुए,
पूनम की देखो चन्द्रिका,
है गीत गाती चांदनी।
गेह में निज रश्मियाँ,
वातायनों से भेज कर,
रंगत घरों की देख कर,
है खिलखिलाती चांदनी।
झींगुर भी बैठा पेड़ पर,
गाता प्रणय के गीत है,
सुर साज लेकर वात से,
संगत मिलाती चांदनी।
आनंदमय माहौल है,
सुहास हँसती है धरा,
सौम्ययुक्त सुस्पर्श से,
है गुदगुदाती चांदनी।
नरेश चन्द्र उनियाल,
“कमली कुंज”
देहरादून, उत्तराखण्ड।



