साहित्य

हे मन

जयचन्द प्रजापति 'जय'

हे मन!
तुम कहां हो?

किस नगरी में
क्यों बहक रहे हो
इधर-उधर के भ्रम में

झूठ-फरेब में
मत लिप्त रहो

ये आसमां
तुम्हे बुला रहा है

कुछ नया गीत लिखने के लिए
कुछ रचना करने के लिए

सुंदरता बिखेरने के लिए
खुशबू फैलाने के लिये

कुछ अमर इतिहास लिखो
सत्य का द्वीप जलाओ

हे मन!
सामने तो आओ
कहाँ छिपे हो?

…..
जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज

 

कविता का भावार्थ…….

यह कविता जयचंद प्रजापति ‘जय’ द्वारा लिखी गई है, जिसमें मन की उद्दंडता को संबोधित करते हुए उसे सृजनात्मकता, सत्य और अमरता की ओर बुलाया गया है। कविता का प्रारंभिक भाव मन से सीधी अपील है—’हे मन! तुम कहां हो?’—जो मन की भटकन को दर्शाता है। यहाँ मन को इधर-उधर की नगरी में भ्रमित, झूठ-फरेब में लिप्त बताया गया है, जो दैनिक जीवन की मायावी दुनिया का प्रतीक है।

कवि मन को चेतावनी देता है कि वह इस भ्रम से ऊपर उठे।आकाश (आसमां) को बुलावा देने वाला तत्व बनाया गया है, जो मन को नया गीत रचने, सुंदरता बिखेरने, खुशबू फैलाने और अमर इतिहास लिखने के लिए प्रेरित करता है। ‘सत्य का द्वीप जलाओ’ पंक्ति विशेष रूप से प्रभावशाली है, जो सत्य को प्रकाशस्तंभ के रूप में चित्रित करती है—अंधेरे भ्रमों के बीच सत्य की स्थापना।

अंत में पुनः ‘हे मन! सामने तो आओ, कहाँ छिप हो?’ से कविता चरम पर पहुँचती है, जो मन की आंतरिक जागृति और सक्रिय भागीदारी की पुकार है।कुल मिलाकर, यह कविता आध्यात्मिक और साहित्यिक जागरण का आह्वान है, जहाँ मन को भौतिक भटकाव से मुक्त होकर सृजन और सत्य के पथ पर लाने का संदेश दिया गया है। प्रयागराज के कवि की यह रचना सरल भाषा में गहन भाव लिए हुए है, जो पाठक के मन को झकझोरती है।

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