चंद्र सुशोभित जिनके सिर पर, हे भोले भण्डारी ।
रुद्र अक्ष उर माल अलंकृत, पद्मासन त्रिपुरारी ।।
कंकर कंकर पत्थर पत्थर, शिव की महिमा बोले ।
सबकी नैया पार लगाते, जय शिव शंकर भोले ।।
जल अर्पण से ही भक्तों पर, कृपा खूब बरसाते ।
कालहुँ के भी काल सदाशिव, कामदेव पर भारी ।।
सत्यम्-शिवम्-सुंदरम् बाबा, डमडम डमरू धारी ।
चंद्र सुशोभित जिनके सिर पर, हे भोले भण्डारी ।।
गौर वर्ण आभा मुख झलके, सर्प कंठ लिपटाते ।
सागर मंथन से शिव शंकर, गरल पान कर जाते ।।
मृत्युंजय का जाप करे तो, श्वास पुनः आ जाता ।
दूल्हा बन नन्दी पर बैठे, *धर्म प्रतीक सवारी ।।
कैलाश विराजे गिरिजा स्वामी, त्रिनेत्र प्रलयंकारी ।
चंद्र सुशोभित जिनके सिर पर, हेभोले भण्डारी ।।
आशुतोष हे हिमगिरि स्वामी, संकट में जग सारा ।
हुई प्रदूषित पावन गंगा, शुद्ध करो जल धारा ।।
गजानंद खेले गोदी में, भर भरकर किलकारी ।
गौरी शंकर सुनो धरा पर, संकट में नर नारी ।।
तुम ही एक सहारा स्वामी, सुन लो अर्ज हमारी ।
चंद्र सुशोभित जिनके सिर पर, हे भोले भण्डारी ।।
*धर्म प्रतीक अर्थात नन्दी की सवारी
धर्म =सत्य, दया, दान और तप
– लक्ष्मण लड़ीवाला ‘रामानुज’




