
किताबें बोलती हैं
हौले हौले जब
सन्नाटा पसरा होता है।
किताबें समेटती हैं
आगोश में जब
मन उदास होता है।
किताबें कितनी गाथाएं
छुपाये होती हैं
हमारी तुम्हारी तरह
अपने हृदय के पन्नो पर।
किताबें हंसती रोती हैं
बात बात पर
नन्ही सी बच्ची जैसे।
किताबें किताबें किताबें।
©संजय मृदुल



