
“क्षण-भंगुर जीवन”
कुछ पलों का जीवन देकर,
अपना अंश संपोषित कर,
नवल श्वांस को फूंँक-फूँक कर,
प्रारब्धानुसार चोला पहनाकर,
कर दिया है है वसुधा शृंगार।
अब जी लो अपने विवेकानुसार,
भविष्य तुझे सँवारना है,
हँसते-हँसाते चलना है,
मुस्कानों के पुष्प खिलाना है।
कर्म की नौका में, जीवन की सवारी ले चलो,
पुनर्जन्म सम्हालने को, आज का दिन जीते चलो।
जो दायित्व लेकर आए हो, उसका ध्यान धरो हरपल,
डोर तो उसके हाँथ गही,
फिर क्यों चिंता चिता गढ़े?
कुछ पलों का जीवन है,
मुस्कान लिए फूलों सा खिल-खिलाते ही चलो,
पतझड़ हो या बसंत,
रंगों के संग खेलते चलो।।
सुषमा श्रीवास्तव,
रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।




