
वक़्त के निधान से,
एक और वर्ष बीत गया।
नये वर्ष के स्वागत में,
वो निभा अपनी रीत गया।
जो मन में था,
मन में ही रहा,
कुछ मन में ही रीत गया।
कुछ बिछड़े, तो कुछ मिल गये,
जो बिछड़ा वो सपना था,
जो मिला वो अपना था।
बंधन सारे तोड़ दिये,
जो तोड़ दी वो रीत थी,
जो रह गई वो प्रीत थी।
श्रीमती लक्ष्मी चौहान ‘रोशनी’
कोटद्वार, उत्तराखंड



