साहित्य

कसक

मंजुला शरण

रिश्तों के दरिया में
बांध उम्र का पाल,
बहती है जिन्दगी की कश्ती ।
मिल ही जाते हैं टुकड़ों में,
#कसक
के शैवाल ।
पंख समेटे परिंदे, अनकहे वादों के
दो कदम साथ चली यादों के ।
रुकती नहीं जिन्दगी,
मुड़ कर नहीं देखती जिन्दगी ।
रिश्तों के दरिया का
नहीं होता किनारा ,
लहरों पर लहर दोबारा…।
जाने क्यूँ मंड़राते हैं,डराते हैं
अनबूझी #कसक
के बादल ।
उड़ा जाता है उम्र का पाल…
रिश्तों के दरिया में भंवर जाल ।
डगमगाती है उम्र की कश्ती
रिश्तों के भंवर में,
हाल बेहाल ।
आता है जब भी
रिश्तों के दरिया में
#कसक
का सैलाब ।

मंजुला शरण
राँची, झारखण्ड़ ।

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