साहित्य

मोरा मनवाँ कहनवाँ न माने…..

लालबहादुर चौरसिया "लाल"

रस-चंद बसंत नेराने सखी।
मोरा मनवाँ कहनवाँ न माने।।

चंदा लरजि के बहोरे अगनवाँ,
मंद मंद महके ला हमरा भवनवाँ,
लागे नैनन से नैन अरुझानें सखी।
मोरा मनवाँ कहनवाँ न माने।।

बरबस लिपट जाले लिलरा से बिंदिया,
आधीआधी रतियाँ चिहुँकि जाले निदिया,
हमका मस्त मदन भरमाने सखी।
मोरा मनवाँ कहनवाँ न माने।।

कलियन के पँखुरी पे नाचे नजरिया,
कयिसे क धीर धरिहें बिरही गुजरिया,
‘लाल’ चहुदिशि कंत लखाने सखी।
मोरा मनवाँ कहनवाँ न माने।।

*रचना-@लालबहादुर चौरसिया “लाल”*
गोपालगंज, आजमगढ़

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