साहित्य

निकटता की सतह के नीचे पसरी अदृश्य दूरी,,,,

सौ, भावना मोहन विधानी

कभी-कभी हम रहते हैं साथ-साथ,
एक पल के लिए भी छूटता नहीं हाथ।
एक राह पर चलते हैं हम हमराही,
कभी महसूस होती नहीं है तन्हाई।

फिर भी दिल का कोई खास कोना,
हर पल लगता है जैसे सूना सूना।
यह कैसी अदृश्य दूरियां होती है?
जो चुपचाप हमसे कुछ कहती हैं।

कभी किसी भाव को समझ ना पाना,
कभी दिल में तन्हाई का उतर जाना।
साथ रहते भी लगता है साथ में नहीं,
दिल समझ नहीं पाता बात अनकही।

साथ रहते भी कुछ रिश्ते बेगाने होते,
धीरे-धीरे ही सही अपनापन है खोते।
लब बोलते हैं पर दिल रहता खामोश,
खुद में समेट लेता तन्हाई का आगोश।

सौ, भावना मोहन विधानी
अमरावती महाराष्ट्र।

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