
शहर के एक प्रतिष्ठित विद्यालय में वार्षिक समारोह था।
मंच पर मेधावी छात्रों को सम्मानित किया जा रहा था।
“इस वर्ष की सर्वश्रेष्ठ छात्रा— आर्या!”
तालियों की गूंज के बीच आर्या मंच पर पहुँची।
उसके पिता की आँखों में गर्व था—
पर वह गर्व थोड़ा असहज भी था।
घर लौटते समय कार में चुप्पी थी।
फिर पिता ने कहा—
“अब पढ़ाई तो बहुत हो गई।
अच्छा रिश्ता आया है। लड़का विदेश में है।
जीवन सुरक्षित रहेगा।”
आर्या ने शांत स्वर में पूछा—
“पापा, सुरक्षित जीवन क्या होता है?”
“जहाँ भविष्य की चिंता न हो।”
“और जहाँ अपने सपनों को गिरवी रखना पड़े,
वह कैसा भविष्य होता है?”
कार एक सिग्नल पर रुकी।
लाल बत्ती की रोशनी आर्या के चेहरे पर पड़ रही थी—
स्थिर, दृढ़, पर विनम्र।
“मैं शादी के खिलाफ नहीं हूँ, पापा।
पर अभी नहीं।
मुझे रिसर्च करनी है।
अपना काम, अपनी पहचान बनानी है।
किसी के नाम से पहले
मैं अपने नाम से पहचानी जाना चाहती हूँ।”
पिता ने पहली बार बेटी को “बच्ची” की तरह नहीं,
एक व्यक्तित्व की तरह देखा।
घर पहुँचे।
ड्रॉइंग रूम में बैठे रिश्तेदार प्रतीक्षा कर रहे थे।
पिता ने धीमे पर स्पष्ट स्वर में कहा—
“मेरी बेटी अभी शादी नहीं करेगी।
वह आगे पढ़ेगी।”
कमरे में हलचल हुई।
किसी ने कहा—
“इतना अच्छा रिश्ता ठुकरा रहे हैं?”
पिता ने मुस्कुराकर उत्तर दिया—
“रिश्ते फिर आ जाएंगे।
पर उसकी इच्छाशक्ति अगर टूट गई
तो वह वापस नहीं आएगी।”
आर्या की आँखें भर आईं।
उसने कुछ नहीं कहा।
बस पिता के पास जाकर खड़ी हो गई।
उस दिन
कोई विद्रोह नहीं हुआ,
कोई घर नहीं टूटा,
कोई घोषणा नहीं हुई—
बस एक पिता ने
अपनी बेटी पर विश्वास किया।
*दया भट्ट दया, खटीमा उत्तराखंड*




