साहित्य

पड़ाव उम्र की यादें

संगीता वर्मा

रेस्टोरेंट में बैठे उम्रदराज दंपति
आपस में भला क्या बतियाते होंगे ?
सब्जी-भाजी के भाव,
दाल, चावल, नमक , आटा
परचून वाले की बही किताब ?

अपने भूले बिसरे ख्वाब
या सात जन्मों का हिसाब ?

कुछ दुखड़े पुराने
या फिर बच्चे सयाने ?

अपनो से मिले जख्म
या कि गैरों को जो बाँटे थे
वे सारे बेशकीमती मलहम ?

चंद बहते हुए दिन
या कुछ ठहरी पड़ी रातें ?
कुछ तो बात करते होंगें ..
शायद बच्चों का कैरियर
अपनी योजनाओं का फेल्यर ?

बीमा किश्तों की देनदारी
किराएदारों से लेनदारी
जमीन जायदाद की हिस्सेदारी,
अतीत की गल्तियां
भविष्य की झलकियां ?

क्या बात करते होंगे ?

किसी फिल्म की समीक्षा
उसके नायक नायिका का नक्शा
किसी किताब का कलेवर
या तो लाकर में रखे जेवर ?

बालों की सफेदी ब्लड प्रैशर की
चिंता शायद न्यूज़ चैनलों पर
चलता एजेंडा
या पिछले बरस बीते खुद
के माता-पिता ?

अक्सर दंपति यह सब तो
घर में ही बतियाते हैं
किसी रेस्टोरेंट में नहीं जाते।

और जब रेस्टोरेंट जाते हैं
तो वहां कुछ भी नहीं बतियाते।

हां यदि ये सचमुच ‘प्रेम’ की
ही बात करते हैं पीछे छूटे
आत्मसम्मान की ही बात
करते हैं तो ये जोड़े वाकई
एकदूजे के करीब
है। इस उम्र में भी पड़ाव उम्र
की यादें ही है बस,,,!!

संगीता वर्मा
कानपुर उत्तर प्रदेश

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