साहित्य

पढ़ा-लिखा गंवार (व्यंग्यात्मक कविता)

जयचन्द प्रजापति 'जय'

एक सज्जन मिले
पढ़े-लिखे लग रहे थे

चमचमाती कार
बीच सड़क पर रोक दी

आवागमन बाधित न हो
बोल पड़ा-

महोदय,बीच सड़क पर कार
आवागमन में बाधा आयेगी

कृपया गाड़ी किनारे लगाकर
महान कार्य में सहयोग करे ंं

गुस्से में सज्जन भड़क गए
सड़क तेरे बाप की है क्या?

आंखें ततेर कर बोला-
कार यहीं रहेगी
जो करना हो कर लो

मैं पढ़ा-लिखा हूँ
हमको चराता है

मैं बोला- ऐसा बोल रहे हो
सड़क क्या आपके बाप की है

मुझे सच में लगता है
आप पढ़े- लिखे गंवार हो
…..
जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज

कविता का भावार्थ——यह कविता जयचन्द प्रजापति ‘जय’ द्वारा रचित एक व्यंग्यात्मक रचना है, जो ‘पढ़ा-लिखा गंवार’ की अवधारणा पर केंद्रित है। इसमें एक सज्जन व्यक्ति सड़क के बीच में चमचमाती कार रोककर आवागमन बाधित करता है।

कवि उसे नम्रता से समझाता है कि कार को किनारे लगाकर ट्रैफिक सुगम बनाएँ, ताकि महान कार्य (लोगों का आवागमन) सहज हो। लेकिन सज्जन गुस्से में भड़क जाते हैं और कहते हैं, “सड़क तेरे बाप की है क्या?” वे अपनी पढ़ाई-लिखाई का हवाला देकर अड़ जाते हैं कि कार यहीं रहेगी। कवि तंज कसते हुए कहता है कि ऐसा व्यवहार करने से लगता है कि आप ‘पढ़े-लिखे गंवार’ हो—यानी शिक्षा प्राप्त होने पर भी ग्रामीण अज्ञानता या अहंकार से ग्रस्त व्यक्ति।

भावार्थ यह है कि सच्ची शिक्षा विनम्रता, समझदारी और सामाजिक जिम्मेदारी सिखाती है, न कि अहंकार या स्वार्थ। बिना बुद्धि के डिग्री मात्र व्यर्थ है; यह आधुनिक समाज के पढ़े-लिखे लोगों के ढोंग और नैतिक पतन पर करारा प्रहार है।

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