
आज भोगवाद का युग है । संचय और संग्रह आज के जीवन की कटु सच्चाई है। बिना इसके आप का इहलोक और परलोक दोनों दाँव पर लग सकते हैं। एक जमाना था जब लोग संचय को महत्व नहीं देते थे। अपरिग्रह और त्याग की बात करते थे आज ऐसा नहीं है लोग जरूरत से ज्यादा इकट्ठा करना चाहते हैं और इसके लिए वे कुछ भी करने को तैयार है। पहले हमारी कामना थी —-
साईं इतना दीजिए,
जामें कुटुम्ब समाय।।
मैं भी भूखा न रहूँ,
साधु न भूखा जाए।।
पहले कुटुम्ब का मतलब था तीन पीढ़ियों और सभी रिश्ते -नातों को अपने में समेटता संयुक्त परिवार। बरगद का वृक्ष। फिर भी किसी प्रकार के संग्रह की कामना नहीं। किसी प्रकार के गलत समझौतों की बाध्यता नहीं । संग्रह नहीं। किसी सुरक्षा की आवश्यकता नहीं। चिंता नहीं। चिंता नहीं तो तनाव नहीं। जितना मिला है उसे भी मिल- बाँट कर खाने की सद इच्छा। अतिथि के सत्कार की इच्छा। दान और परोपकार की इच्छा। आज सब बदल गया है ।
आज हमारी इच्छाएं सागर की उत्ताल तरंगों से होड़ ले रही हैं। हमारी प्रार्थना केवल हम तक सीमित है ।
साईं इतना दीजिए,
सौ पीढ़ी तर जाय।।
मैं ही खाऊँ पेट भर,
और भाड़ में जाय।।
नैतिक मूल्य और आदर्श आज शो पीस बनकर रह गए हैं,वास्तविकता के धरातल पर ये बुरी तरह धराशायी हो चुके हैं।आज हमारा कुटुंब पति -पत्नी और दो या एक बच्चे तक सीमित हो गया है। लेकिन इच्छाएं असीमित हैं। अतिथि की तो बात ही छोड़ी, तिथि और टाईम लेकर आने वाले लोग भी हमें अखरने लगे हैं। उन्हें टेलीफोन पर ही टरका देने की चाह होती है।
हम भूल गए हैं कि जैसा करेंगे वैसा भरेंगे।आज तुमने जिसे टरकाया, कल वो तुम्हें टरकाएगा। सामाजिकता और सौहार्द सभी लुप्त प्राय हैं।
भौतिकता की चकाचौंध ने आज हमारी विवेक दृष्टि को अंधा कर दिया है। येन केन प्रकारेण केवल पाने को आतुर आज हम कुछ भी खोने को तैयार हैं ।और हमारे इसी लालच ने हमें एक ऐसे बाजा़र में ला खड़ा किया है, जिसके नारे आकर्षक हैं लेकिन परिणाम भयावह है। पतन है। पतन आदर्शों का, संस्कारों का, संवेदना का, नीतियों का, मानवता का। यहाँ मात्र अट्टहास है धनतंत्र का। छल तंत्र का।
एक बार अपनी झोंक में आ कबीर भी जा खड़े हुए थे बाजार में।
कबीर खड़ा बाजार में
माँगे सबकी खैर।।
न काहू से दोस्ती ,
नहि काहू से वैर।।
लेकिन कबीर का बाजा़र में खड़े होना उनके लालच,
स्वार्थ सिद्धि,उनकी दूसरे की साख मिटा कर खुद को प्रतिष्ठापित करने की भावना को नहीं दर्शाता। वह सबका कल्याण और निस्संग भाव ले बाजार में उतरते हैं। सच्चा सौदा करते हैं क्योंकि उन्हें हर जगह उस लाल की लाली नजर आती है, जिसमें अनुरंजित मन बाजार में खड़ा रह कर भी स्वयं और दूसरों का हित चिंतन ही करता है। लेकिन हमारा बाजा़र में खड़े होना मात्र दूसरों को और अपने को ठगना है। हम पहले से ही लाभ और हानि का गणित समझकर ही बाजार में उतरते हैं। ऐसी मानसिकता, भौतिकता के धरातल पर भले ही शहमें सफल बना दे, अध्यात्म और चरित्र के क्षेत्र में रसातल तक पहुँचाती है।
चंद रूपयों की खातिर हम अपनी भाषा भूल दूसरों के सुर में बोलने लगते हैं। कलुषित राजनीति के दलदल आकंठ डूबे आकाओं के तलवे सहलाते हैं। अपने आत्म- सम्मान को तिलांजलि दे देते हैं।सत्य को जान बूझकर
झुठलाते और झूठ का महिमा मंडन करते हैं।
हम भली भाँति जानते हैं
कि हमारा यह आचरण
विनाशकारी है। जब- जब भी अन्याय और असत्य के पक्ष में सत्य मूक होता है तो महाभारत होता है। भीष्म और धृतराष्ट्र की असत्य के पक्ष में चुप्पी का परिणाम कुरूक्षेत्र होता है। हमें इतिहास के पन्नों से यह सबक सीखना होगा कि असत्य को आईना दिखाने का काम हमें बेखौफ़ होकर करना चाहिए।आज हर कोई सच्चाई जानता है। पर अवसरवादिता और स्वार्थ हमें इसका पक्ष नहीं लेने देता।
ऐसी स्धिति में हम मूक दर्शक नहीं रहते, हम अन्याय के मूक भागीदार हो जाते हैं। और इस बात को हमसे अच्छी तरह कोई नहीं जानता।लेकिन हम अपने मन को खोखले दिलासे दे लेते हैं ।
बिकने का यह तंत्र जाल बहुत बड़ा है ।वैसे बिकने का यह फार्मूला एकदम नया नहीं है बहुत पुराना है। चाणक्य नीति के चार प्रमुख अंग साम, दाम, दंड, भेद में से दाम यही है।आज हर चीज क्रय- विक्रय के लिए उपलब्ध है। राजनीति, शिक्षा,धर्म ,न्याय, वाणिज्य, राष्ट्रीयता , ईमान दारी ,स्वाभिमान,सामाजिक संबंध । सभी ऊंची -ऊँची दुकानों में सजे हैं ,पर यह पकवान कितने बदज़ायका हैं,यह चखने वाले किसी को नहीं बताते। अपनी- अपनी संकीर्णताओं से धिरी ज़िंदगी आज घिसट रही है, उसके रंग दिखावटी हैं। ।
हम भूल जाते हैं कि कभी न कभी तो यवनिका पतन होगा ही । काठ की हाँडी बार बार नहीं चढ़ती। शैतान की दाल रह बार नहीं गलती। हमारा बिकना आज का युग धर्म नहीं ,हमारी स्वार्थ पूर्ण मान सिकता है। हम परिस्थितियों के साथ चलने का झूठा दिखावा करते हैं। समस्या के समाधान के अनेक रास्तों को जानते हुए भी सबसे सरल लेकिन गल़त रास्ता अपनाते हैं। अपने को जस्टीफाई करने के लिए बेचारे पन का ढोंंग रचाते हैं ।,
ज़रुरत है हम गलत दिशा में बढ़ते कदमों को रोकें। अपनी संस्कृति और परम्परा की अमोल धरोहर को यदि आगे नहीं बढ़ा सकते तो कम से कम उसे विकृत न करें। भविष्य की रक्षा आज के हाथ में है। हम अपने कर्तव्य से मुंँह न मोड़े ताकि आगत हम पर दोषारोपण ना करे । मैं इसी सुखद विराम की प्रतीक्षा में हूँ।
वीणा गुप्त
नई दिल्ली




