साहित्य

पलकें

चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा "अकिंचन "

पलकें
नयनों का नयनों से,गोपन सम्भाषन ,
पलकें निरखा करतीं होकर अपलक ।
कामसूत्र के सूत्र वांचती होकर पारंगत,

उठती,गिरती,नर्तन करतीं बनें उलोचक।।
सुभाषित है इनका भाषा ज्ञान अपरिमित ,
पलकें तनतीं,हैं कभी रोकतीं स्थिर होकर।
प्रवंचित करतीं, कर देती ये हैं परिसीमित ,
कभी ये पलकें,मौन निमंत्रण देतीं गिरकर।।
पाँवड़ें बिछातीं कर देतीं भावों को मधुरित ,
हैं आवरण डालतीं संजोती जब ये अलकें ।
भुजबंधन का कटिबंधन में कर प्रत्यावर्तन ,
वक्र कलाधर सी शयन कराती हैं ये पलकें ।।
पर कलुषित नयनों का तजतीं हैं आमंत्रण ,
शाही के काँटे सी चुभती हैंं संधानी पलकें ।
नागफनी सी फन फैलाती, कजरारी पलकें ,
डंसित करती ,जहर उगलती हैं ये पलकें ।।
चतुर मछेरिन इन अँखियन की,सौगाती हैं पलकें,
कमठ पीठ सी,बिछी हुई जाल बन जाती हैं पलकें।
संतरित हुई नदप्रवाह में आ गयी तरँती, हैं फंँसती,

बांट बटखरा रखतीं, तौलती हैं,भावों को ये पलकें।।
भर आयी आँखों के अश्रुकणों को ढोती हैं ये पलकें,
सुख-दुख सहतीं, विविध खेल खिलातीं हैं ये पलकें।
नयनों का खुलना,पुनि बंद हो जाना,उन्मीलित होना,
जन्म मौत के दर्शन को दर्शाती हैं ये यायावर पलकें।।

चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा “अकिंचन “गोरखपुर**
चल भाष -9305988252

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