
रंग सभी जन खेल रहे मिल के वृषभानु लगा मन कृष्णा।
प्रीत रही मन में मन मीत बना तब छोड़ दई सब तृष्णा।
खेल रहे जब प्रेमिल होकर आतुर जीवन छोड़ वितृष्णा।
छेड़त गैल रहे तब श्याम कहे मन मोहित बोल सुदेष्णा।।
प्रेम सदा तुम जीवन में करना तब खेलत प्रेमिल होली।
ग्वाल- सखा जब बोल रहे तब ही बनती मन भावन टोली।
प्रीत सभी जन से करती सुख की लगती रह *प्रेमिल रोली*।
मीत मिले प्रभु के मन सा सबके घर में खुशियाँ जब डोली
श्याम दया सब पे रखना मन कष्ट रहे सबके हर लेना।
मोह सदा कब छोड़त है जग को मन को हरि ही कर देना।
जीवन दो दिन का रहता पल में जब श्वास रहे जब खेना।
हे यदुनाथ कृपा करके अब दूर करो यम की यह सेना।
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डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण
छतरपुर मध्यप्रदेश



