
प्रेम गली अति पावन जानो,
इसे सत्य की मूरत मानो।
हृदय बीच हो इसका वासा,
मिट जाए सारी दुराशा।
बिना शब्द यह सब कह देता,
कष्ट पराया खुद सह लेता।
स्वार्थ बिना जो प्रीति बढ़ाए,
वही जगत में आदर पाए।
जैसे जल में मीन समाई,
प्रेम डोर वैसी है भाई।
मौन रूप की भाषा प्यारी,
जग से इसकी रीति निराली।
त्याग और विश्वास समाया,
इसने जग को स्वर्ग बनाया।
धूप छाँव में साथ निभाता,
सच्चा प्रेमी ही सुख पाता।
कण-कण में यह ईश दिखाता,
जीवन का आधार कहाता।
इसकी महिमा वेद बखाते,
सुर असुर सब प्रेम धुन गाते ।
स्वाति पांडेय ‘ प्रीत ‘
राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी
साहित्य साधक सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थान लखनऊ




