
(१)
पीत वसन धर वृक्ष खड़े, सूनी हर इक डार,
झरते पात सुनाते हैं, जीवन का व्यवहार।
आज हरे जो गर्वित थे, कल होंगे लाचार—
क्षणभंगुर संसार का, यही सच्चा आधार।
(२)
डाली से बिछुड़े पात जब, रोई मंद पवन,
बीते सावन याद कर, भीगा उनका मन।
अहम् गया, अभिमान ढला, टूटा हर आकर्षण—
मिट्टी में मिल सिखला गए, त्यागमय जीवन।
(३)
पूरब की बयार चली, उड़ते पात उदास,
रूप-रंग सब ढल गया, खोया सारा हास।
कल तक जिनकी छाँह में, मिलता था विश्वास—
आज वही बिखरे पड़े, लेकर मौन निवास।
(४)
पतझड़ का संदेश है, मत करना अभिमान,
सुख-दुख दोनों संग रहें, यह जग का विधान।
झरकर भी उपयोगी बने, यही श्रेष्ठ पहचान—
जलावन बन ताप दें, कर जाएँ कल्याण।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार




