
शिव बड़ा ही दयालु बड़ा ही भोला भाला।
जटा से बहती गंगा कंठ में है नाग काला।।
अंग विभूति रमाये हुए नंदी दर पे बिठाये हुए।
बड़ा ही अनौखा बड़ा निरालाबेष जोगी वाला।।
बैठे हुए हैं धूनी रमाये राम प्रभु के गुण गाये।
तन पे बाघम्बर सोहे बैंठने को पड़ी मृगछाला।।
पंचामृत स्नान कराये आक धतूरा भोग लगाये।
सुधा रस देव दिये खुद पीते हैं बिष का प्याला।।
देवों के देव महादेव नित्य ही इनके गुण गाऊँ।
अमर प्रेम जग रहता मुसीबत से सबको निकाला।।
डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण
छतरपुर मध्यप्रदेश



