साहित्य

शुमार

जाने कितने सवाल करते हैं
अजनबी लोग हैं नफ़रत की बात करते हैं!!
फूलों के चमन में रहते हैं दुनिया वाले
वक़्त बदलते ही कांँटो की बात करते हैं!!
अपनों का साथ ये नहीं देते
ज़ख़्म देकर मरहम की बात करते हैं!!
बहुत उदासी है हमारे घर में
दर-ओ-दीवार आपस में बात करते हैं!!
उनके ठुकराए हुए लोग अब किधर जाएं
प्यार जो बेशुमार करते हैं!!
नींद आती नहीं है रात भर हमको
रोज ही ख़ाना ख़राब करते हैं!!
वह लोग हमको भले नहीं लगते
जो लोग हमसे सवाल करते हैं!!
शुमार करते हैं मुझे वह अब दुश्मनों में
दुआ मेरे मर जाने की बार-बार करते हैं!!
ग़लतियांँ ख़ुद की नज़र नहीं आती
और बे-अदबी भी से बात करते हैं!!
जब से पैदा हुए हैं बुरे हैं हम,
आप हमें किस मे शुमार करते हैं..!

– राजीव त्रिपाठी
उदयपुर राजस्थान

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