
जीवन का साथी मेरा वो न बना,
जिसको हमने मान बैठा था
वो साथ क्या देगा मेरा बन कर
जिसको हमने मान बैठा था,,,,।
वो खून क्या होगा गैरों का मेरा
जो अपना नहीं पराया था
बरगद न मेरा वो अपना था
औरों से मांग कर लाया था
आंखों की रौशनी मेरा वो न बना, जिसको,,,।
आंखों की ज्योति कम होती है
तो राहों में इशारा करती है
थका तूं मुसाफ़िर सोच न जरा
यूं जिंदगी सबकी गुजरती है
जिंदगी के सफर में मेरे वो न चला, जिसको,,,,।
बैर की गुठली क्या मोल देगी
कांटे ही वो देती रहती है
व्यथा क्या जानेगी जिंदगी की
कांटे ही वो देती रहती है
कभी साथ रहा न दीपक सा जला, जिसको,,,,,।
विद्या शंकर विद्यार्थी रामगढ़, झारखंड




