साहित्य

समाज की दर्पण

उदय किशाोर साह

तुम्हारी हूँ अल्फाज   तुम्हारी मैं आवाज
सर पे कफन बनी मेरी एक       सरताज
कलम की सिपाही , हूं लिखना मेरी काज
घर से निकला हूँ  छोड़ मोह माया मैं आज

सत्य को है देखना     सत्य ही है   लिखना
सभ्य समाज का    दर्पण है हमें      बनना
देैनिक भास्कर का     मैं छोटा एक सिपाही
नहीं चाहिये हमें झुठी     तोहफा  वाह वाही

फिर भी असामाजिक     तत्व देते हैं धमकी
समाज में है कुछ कोढ़ कुछ    पागल सनकी
प्रजातंत्र का मैं हूँ चौथा एक मजबूत पायदान
मत कर कलमकार को तूँ   कभी भी अपमान

जब अपराध की होती है  जग में कोई घटना
या होता है शाररिक मानसिक की कहीं वेदना
उसके लिये उठती है कलम की जग में आवाज
समाज  का दर्पण है पत्रकार की ये एक साज

समाज सेवा है कलमकार की  कलम   सर्मपण
अपनी जिन्दगी की कर दी     कलमकार अर्पण
कलमकार ही है समाज का    एक सच्चा दर्पण
करना मेरे साथी कलमकार      का सब सर्मथन

कलम को नहीं है किसी भी जन से कोई बैर
कैमरे की नजर से ना है अपराध को      खैर
मीडिया जगत में है    कलम एक बहादूर शेर
कोई मत दिखलाओ   हमें अपनी आँखें तरेर

उदय किशाोर साह
मो० पो० जयपुर जिला बांका बिहार

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