साहित्य

लिखा परदेश किस्मत में वतन की याद क्या करना:

डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’

ग़रीबी में पला था सूखी रोटियाँ खाकर,
बचपन से जवानी तक रहा था औरों का चाकर,
क़िस्मत में लिखा था मेहनत मज़दूरी करना,
ज़िन्दगी बीतती है ग़रीबों की झोपड़ी में रहकर।

कहाँ से लाये वो दौलत जिसका पेट बिन निवाला है,
दो जून की रोटी मात्र भर सपना जिसे उसने पाला है,
नहीं देखा कभी शान से रहने का सपना,
सुबह से शाम तक बस पसीना निकाला है।

भरोसा तो खुद अपनी साँसों का भी नहीं होता है,
पर इंसान दुनिया के इंसान पर भरोसा करता है,
ग़रीबी का तक़ाज़ा है कि खुदी को कर बुलंद इतना,
कि हर तकदीर से पहले,
खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है।

कवि इक़बाल के शब्द उर्दू के निसंदेह जोश भरते हैं,
ग़रीबों की उम्मीद में उत्साह का संचार करते हैं,
पर हक़ीक़त में कहाँ कोई इन शब्दों को बदल पाता है,
यही मुद्दा है कि हर इंसान सफलता चाहता है।

यह दीगर है कि सफलता के अर्थ अलग होते हैं,
कोई अथाह धन दौलत कमाना चाहता है,
कोई योग्यता अर्जित कर नाम कमाना चाहता है,
कोई सफल और कोई बिलकुल नहीं हो पाता है ।

जो सफल नहीं हो पाते वह भाग्य को दोष दे देते हैं,
लेकिन क्या भाग्य या साधन को दोष देना सही है,
लिखा परदेस क़िस्मत में वतन की याद क्या करना,
जहाँ बेदर्द हाकिम हो आदित्य वहाँ फ़रियाद क्या करना।

एक विनय असंभव संभव कर देता है

एक गीत वक्त में परिवर्तन लाता है,
एक विचार दुनिया ही बदल देता है,
एक कदम यात्रा की शुरू कर देता है,
एक विनय असंभव संभव कर देता है।

निराशा कुछ ऐसे घर कर गई है,
सोच लिया कि अपना कोई नहीं है,
पुत्र-पुत्री, बहू-दामाद की अमानत हैं,
शरीर, ज़िंदगी मौत की अमानत हैं।

बेटा बहू आप दोनों की अमानत हैं,
बेटी दामाद भी आपकी अमानत हैं,
शरीर तो नश्वर है श्मशान जायेगा,
मरण निश्चित है समय पर आयेगा।

फिर इन सब पर सोचकर अपना
वर्तमान भी क्यों कष्टकर बनाना है,
जीवन अनमोल है ख़ुशी से जीना है,
परिवर्तनशील सत्य को निभाना है।

आदित्य जीवन में दुख बुरा होता है,
जब भी आता है, बहुत रुलाता है,
पर सत्य यह है दुःख अच्छा होता है,
वह बहुत बड़ी शिक्षा देकर जाता है।

डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
लखनऊ

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