साहित्य

सूर्योदय

विनीता चौरासिया

जब धरा के अंक में,करता रवि अठखेलियाँ ।
तब चमक उठते शिखर है,और पर्वत श्रेणियाँ |

जब नवल अरुणिम सी किरणें,अवनि का करती आलिंगन ।
नदियों की धारा से मिलती, जैसे हो सहेलियाँ॥

तब तृणों की नोकों पर, हिमबिन्दु मोती से चमकते । सीप के मुक्तक भरी ज्यों, हाथों की हथेलियाँ॥

वो भास्कर धरा पर आकर, यूँ आस का उजास लाता ।
रात की ज्यों उलझी-उलझी, सुलझी हो पहेलियाँ॥

विनीता चौरासिया
शाहजहाँपुर उत्तर प्रदेश

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