
मेरे पास देने को कुछ भी नहीं,
न सोने की चूड़ियाँ, न मोतियों का हार,
मैंने बस शब्दों को सँवारा है,
और दिल को किया है तैयार।
ये जो काग़ज़ पर उतरे हैं,
ये स्याही की लकीरें नहीं,
हर अक्षर में धड़कन रखी है,
ये बस लिखी तक़दीरें नहीं।
जब दुनिया साथ छोड़ देगी,
भीड़ में तन्हा कर जाएगी,
याद रखना — ये कविता मेरी
तुम्हें चुपके से गले लगाएगी।
मैं ख़ामोश रह जाऊँ अगर,
समझ लेना मैं पास हूँ,
तौहफ़े अल्फ़ाज़ के देकर
मैं हर पल तुम्हारे साथ हूँ।
अतुल पाठक




