
वो भी आती नहीं,
हम भी बुलाते नहीं!
यूँ ही रूठने से
घर बसाते नहीं!!
वो कहती नहीं,
हम जताते नहीं,
दिल में ज्वाला मगर
हम दिखाते नहीं।
वो नाराज़ सी —
हम भी ख़ामोश से,
दोनों जिद में मगर
मुस्कुराते नहीं!
अरे! बात इतनी-सी —
अहं थोड़ा झुका दो,
ये रिश्ते खिलौने नहीं
जो गिरा दो, उठा लो!
ज़रा प्यार से बोल दो
“सुनो जी…” कभी,
हम भी पत्थर नहीं
पिघल जाते नहीं?
रात करवट में बीते,
सुबह तानों में जाए,
ऐसे दाम्पत्य के दीप
कहाँ जगमगाए?
जीत किसकी हुई?
हार घर की हुई!
ऐसे आँगन कभी
फल-फूल पाते नहीं!!
सुनो प्रिये!
ये रणभूमि नहीं ,
ये तो जीवन है!
दो कदम तुम बढ़ो ,
घबराओ बिल्कुल नहीं!!
हाथ थामो ज़रा,
होंठ मुस्का दो ज़रा,
प्यार के गीत यूँ
रुक जाते नहीं!
“दिव्य” मंच से कहे —
छोड़ो ये चुप्पियाँ,
घर मोहब्बत से बसते हैं,
जिद से बसाते नहीं!!
✍️ दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’
जनपद संभल उत्तर प्रदेश



