साहित्य

समाज क सेवा

चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा "अकिंचन "

सोचत नीमन योजना, मिलय लोक सम्मान,
पद पइसा मान प्रतिष्ठा, होवै नैतिक उत्थान।
होवै नैतिक उत्थान,करम क साधन ह चन्दा,
सेसर पद पावै क लोभ,गटहि में डारत फन्दा।
अधिवेशन हर साल करावत,धन्धा ह नोचल,
चन्दा रहत विलाय,योजना नीमन ह सोचत।।
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गद्दी क ह चाहना, करल न चाहत कछु काम,
समय नाहिं बा संग पै,कामना होवै बहु नाम।
कामना होवै बहु नाम, टका ना ह दान करत,
देखत जहाँ जमात,बहुत विद्वान बनै फिरत।
जिम्मेदारी ढाँव करै, बात करि देवत ह भद्दी,
कहत अकिंचन सुनहु,चाहत है ऊँचहन गद्दी।।
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सेवा करे समाज क,चललन अइसन नव भक्त,
तन मन धन तीनहूँ तरह,रहत ह दुखिया शक्त।
रहत ह दुखिया शक्त, जेके केहू ना परछे पूछे,
बन के मंत्री अध्यक्ष,ऐंठत फिरत ह निज मूँछें।
चन्दा लेवे जाय जब,पावत गालिन क बस मेवा,
साथी जन झल्लात,छोड़हू समाज क अस सेवा।।
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मंतरी जी व अध्यक्ष जी, निहारत हं सबहीं ओर,
बा अइसन कउनों शूरमा,चंदा लावहिं झकझोर।
चंदा लावहिं झकझोर,यही बा मजगर कार करारे,
लेके कटोरा हाथ निज,जाये कऊन दुआरे दुआरे।
केहू गाँठ क पुरहर दानी,केहू मिलत दानीश हंटरी,
कहत अकिंचन सुनहु तात, बस होय जाय मंतरी।।
✍️ चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा “अकिंचन
चलभाष- 9305988252

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