साहित्य

ज़िन्दगी

शशी कांत

बहुत थक गया हूँ
ज़िन्दगी का बोझ,
ढोते ढोते,
सफर में मिला,
बहुत कुछ,
चलते चलते,
कुछ खट्टी,
कुछ मीठी -यादे
पर..,
अब नहीं चला जाता,
सफर के आखिरी,
मुकाम पर …,
बहुत थक गया हूँ,
ज़िन्दगी का बोझ,
ढोते -ढोते ….||

शशि कांत श्रीवास्तव
डेराबस्सी मोहाली, पंजाब

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