
आता हूं ,
तुम्हारे कब्र के पास —-रोज,
मिलने को —-तुमसे!
जहाँ पर ,
सोई हुई हो,अपनी रूह के संग,
सुकून की नींद—!
जब जगती हो -और,
आकर बाहर खोजती हो,
पर , न पाकर मुझे,
तुम …..,
व्याकुल न हो जाओ-कहीं
तभी तो ,
आता हूं ,तुम्हारे पास,
मिलने को तुम्हारी रूह से,
जहाँ पर तुम सोई हुई हो,
देखते ही देखते –एक दूजे को,
कब हम ,आलिंगनबद्ध होकर,
खो जाते हैं….वहीं,
उसी ,कब्र के ऊपर,
जहाँ पर ,
सोई हुई हो,अपनी रूह के संग ||
शशि कांत श्रीवास्तव
डेराबस्सी मोहाली ,पंजाब
स्वरचित मौलिक रचना .




