*श्लोक:*
*सर्वभूतेषु* *शक्तिरूपेण* *संस्थिता।*
*नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥*
यह दिव्य श्लोक देवी महात्म्य का अत्यंत गहन और व्यापक अर्थ लिए हुए एक महत्त्वपूर्ण मंत्र है, जिसमें उस सर्वव्यापी शक्ति को नमन किया गया है जो *“सर्वभूतेषु”* अर्थात समस्त प्राणियों, तत्वों और अस्तित्वों में *“शक्तिरूपेण संस्थिता”* जो ऊर्जा स्वरूप में स्थित है। यहाँ *“शक्ति”* केवल देवी का सीमित या प्रतीकात्मक स्वरूप नहीं है, बल्कि वह मूल चेतना है, जो इस समस्त सृष्टि में प्रवाहित हो रही है। भारतीय चिरपुरातन एवं नितनूतन अद्वैतदर्शन के अनुसार यह सम्पूर्ण जगत उसी एक परम सत् का विस्तार है, इसलिए इस श्लोक में व्यक्त नमन वास्तव में उस एकत्व सत्ता के प्रति है, जो सबमें समान रूप से विद्यमान है।
*शब्दार्थ*
*सर्व* = सब, सम्पूर्ण, प्रत्येक
*भूतेषु* = सभी प्राणियों/सत्ताओं में (भूत = जीव या अस्तित्व)
*शक्तिरूपेण* = शक्ति के रूप में, ऊर्जा स्वरूप में
*संस्थिता* = स्थित, स्थापित, विद्यमान
*नमः* = नमस्कार, वंदन
*तस्यै* = उस (देवी/शक्ति) को
*नमस्तस्यै* = उस शक्ति को नमस्कार
*नमो नमः* = बार-बार नमस्कार, पूर्ण समर्पण सहित वंदन
*संपूर्ण भावार्थ* : जो शक्ति सभी प्राणियों में ऊर्जा स्वरूप में स्थित है, उस देवी को बार-बार नमस्कार है।
*“सर्वभूतेषु”* शब्द इस श्लोक का मूल आधार है। यह शब्द हमें यह समझाने का प्रयास करता है कि यह शक्ति किसी एक स्थान, समय, रूप या व्यक्ति तक सीमित नहीं है। वह हर जीव में, हर वस्तु में, हर परिस्थिति में और हर स्तर पर विद्यमान है। चाहे वह सूक्ष्म चेतना हो या स्थूल प्रकृति, चाहे वह जड़ पदार्थ हो या सजीव प्राणी—हर जगह वही शक्ति कार्यरत है। अद्वैतदर्शन इस सत्य को और भी स्पष्ट करता है कि द्वैत, अर्थात भिन्नता का अनुभव, वास्तव में अज्ञान का परिणाम है। जब ज्ञान का प्रकाश होता है, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि सबमें वही एक सत्ता विद्यमान है।
जब हम कहते हैं *“शक्ति सर्वभूतेषु स्थित है”*, तो इसका अर्थ यह नहीं कि अलग-अलग प्राणियों में अलग-अलग शक्तियाँ हैं, बल्कि यह है कि सभी में वही एक ही शक्ति विभिन्न रूपों में अभिव्यक्त हो रही है। जीव में जो प्राण है, वही शक्ति है; मन में जो विचार है, वही शक्ति है; प्रकृति में जो गति और परिवर्तन है, वह भी उसी शक्ति का प्रकट रूप है। इस प्रकार यह शक्ति सृष्टि के प्रत्येक स्तर पर कार्यरत है और समस्त अस्तित्व को संचालित कर रही है।
*“शक्तिरूपेण संस्थिता”* का तात्पर्य यह है कि यह शक्ति केवल सैद्धांतिक या दार्शनिक अवधारणा नहीं है, बल्कि यह एक जीवंत, सक्रिय और गतिशील सत्य है। यही शक्ति सृजन का कारण बनती है, वही पालन करती है और वही संहार भी करती है। सृष्टि का आरंभ, उसका विस्तार और उसका अंत तीनों इसी शक्ति के अंतर्गत होते हैं। माता में जो वात्सल्य और करुणा है, वह शक्ति है; वीर में जो साहस और पराक्रम है, वह शक्ति है; ज्ञानी में जो प्रकाश और विवेक है, वह शक्ति है; और साधक में जो धैर्य और तप है, वह भी उसी शक्ति का स्वरूप है।
शक्ति केवल किसी बाहरी सत्ता का नाम नहीं, बल्कि यह जीवन के प्रत्येक अनुभव में विद्यमान है। हम जब भी प्रेम करते हैं, सेवा करते हैं, त्याग करते हैं या साधना करते हैं, तो हर बार वही शक्ति हमारे भीतर कार्य कर रही होती है।
*“नमस्तस्यै-नमस्तस्यै-नमस्तस्यै”* का तीन बार उच्चारण इस श्लोक का अत्यंत गूढ़ और आध्यात्मिक पक्ष प्रस्तुत करता है। यह तीन बार नमस्कार केवल काव्यात्मक पुनरावृत्ति नहीं है, बल्कि यह साधना का क्रम है। प्रथम नमस्कार शरीर का है, जहाँ हम अपने कर्मों को उस शक्ति को अर्पित करते हैं। द्वितीय नमस्कार मन का है, जहाँ हम अपने विचारों, भावनाओं और इच्छाओं को उस शक्ति के अधीन मानते हैं। तृतीय नमस्कार आत्मा का है, जहाँ अहंकार का पूर्ण विसर्जन होता है और “मैं” का भाव समाप्त हो जाता है।
*“नमो नमः”* इस समर्पण की अंतिम अवस्था है, जहाँ साधक पूर्ण रूप से उस शक्ति में विलीन हो जाता है। यह वह स्थिति है जहाँ साधक और साध्य का भेद समाप्त हो जाता है और केवल एकत्व की अनुभूति शेष रहती है। यही अद्वैत का चरम अनुभव है।
अद्वैत वेदांत के अनुसार आत्मा और ब्रह्म में कोई भेद नहीं है— *“अहं ब्रह्मास्मि”*। जब कहा जाता है कि शक्ति *“सर्वभूतेषु संस्थिता”* है, तो इसका अर्थ यह है कि हर जीव में वही आत्मा विद्यमान है और वही आत्मा शक्ति का स्वरूप है। इस प्रकार शक्ति, आत्मा और ब्रह्म तीनों एक ही सत्य के विभिन्न नाम हैं। जब हम किसी अन्य को नमस्कार करते हैं, तो वास्तव में हम अपने ही भीतर स्थित उस दिव्य तत्व को प्रणाम कर रहे होते हैं।
यह अनुभूति जब स्थिर हो जाती है, तब मनुष्य के भीतर से भेदभाव समाप्त हो जाता है। वह किसी को ऊँचा या नीचा नहीं देखता, किसी को अपना या पराया नहीं मानता। उसके लिए सब एक समान हो जाते हैं, क्योंकि वह हर किसी में उसी शक्ति को देखता है।
इस श्लोक का महत्व केवल आध्यात्मिक चिंतन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मार्गदर्शन प्रदान करता है। जब हम हर प्राणी में उसी शक्ति को देखते हैं, तो हमारे भीतर सम्मान और करुणा का भाव स्वतः उत्पन्न होता है। हम दूसरों के साथ प्रेम, सहानुभूति और सहयोग का व्यवहार करते हैं। हम किसी के साथ अन्याय या हिंसा नहीं कर सकते, क्योंकि हमें यह ज्ञात होता है कि वह भी उसी शक्ति का रूप है।
प्रकृति के प्रति भी हमारी दृष्टि बदल जाती है। हम पेड़ों, नदियों, पर्वतों और समस्त पर्यावरण को पूजनीय मानते हैं, क्योंकि हम उनमें भी उसी शक्ति का अनुभव करते हैं। इस प्रकार यह श्लोक हमें एक संतुलित, समरस और संवेदनशील जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
साथ ही, यह श्लोक हमें अपनी आंतरिक शक्ति का बोध भी कराता है। जब हम यह समझते हैं कि वही शक्ति हमारे भीतर भी विद्यमान है, तब हमारे भीतर आत्मविश्वास और साहस उत्पन्न होता है। हम स्वयं को कमजोर या असहाय नहीं मानते, बल्कि अपने भीतर स्थित उस दिव्य शक्ति को पहचानते हैं।
परंतु अद्वैतदर्शन केवल प्रेरणा ही नहीं देता, बल्कि एक सूक्ष्म चेतावनी भी देता है। यदि हम इस सत्य को भूल जाते हैं कि सभी में वही शक्ति विद्यमान है, तो हम अहंकार, भेदभाव, द्वेष और हिंसा में फँस जाते हैं। यही अज्ञान हमें दुःख और बंधन के चक्र में डाल देता है। जब हम दूसरों को अलग मानते हैं, तब संघर्ष उत्पन्न होता है; जब हम स्वयं को श्रेष्ठ मानते हैं, तब अहंकार उत्पन्न होता है।
इसलिए यह श्लोक हमें निरंतर स्मरण कराता है कि हम इस एकत्व को पहचानें और हर प्राणी में उसी शक्ति का सम्मान करें। किसी के प्रति द्वेष रखना, वास्तव में उसी शक्ति का अपमान करना है।
अंततः यह श्लोक साधक को उस परम अवस्था तक ले जाता है, जहाँ सभी भेद समाप्त हो जाते हैं। देखने वाला, देखा जाने वाला और देखने की प्रक्रिया तीनों एक ही शक्ति के रूप में प्रकट होते हैं। यही अद्वैत का परम सत्य है। जब यह अनुभूति स्थिर हो जाती है, तब साधक के भीतर से सहज ही यह भाव प्रकट होता है—
*“नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।”*
यह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण, एकत्व और आत्मबोध की अनुभूति है, जहाँ सब कुछ उसी शक्ति में विलीन हो जाता है।
✍️ योगेश गहतोड़ी ‘यश’




