साहित्य

छोटी सी भलाई: बड़ा काम

डा० कर्नल आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’

एक नाविक ने एक पेंटर को बुलाया
और अपनी नाव पेंट करने को कहा,
पेंटर ने नाव को लाल पेंट कर दिया,
जैसा नाव का मालिक चाहता था।

पेंटर अपने पैसे लेकर चला गया,
अगले दिन पेंटर के घर वह नाविक
पहुँचा और उसने एक बड़ी धनराशि
का चेक उस पेंटर को लिख कर दिया।

पेंटर भौंचक्का रह गया और पूछा,
किस बात के इतने पैसे दे रहे हैं,
मुझे मेरे पेंट व पेंटिंग करने के सारे
पैसे तो आपने कल ही दे दिया था ?

मालिक ने कहा ये पेंट का पैसा नहीं है,
बल्कि ये उस नाव में जो “छेद” था,
उसको भी रिपेयर करने का पैसा है,
और आपके अच्छे काम का पैसा है।

पेंटर ने कहा अरे साहब, वो तो एक
छोटा सा छेद था, जो मैंने बंद कर
दिया था, उस छोटे से छेद के लिए
इतना पैसा लेना ठीक नहीं लग रहा।

मालिक ने कहा दोस्त, तुम्हें पूरी बात
पता नहीं, मैं विस्तार से समझाता हूँ,
जब मैंने तुम्हें पेंट के लिए कहा तो
जल्दी में तुम्हें छेद बताना भूल गया था।

और जब पेंट सूख गया, मेरे दोनों
बच्चे उस नाव को समुद्र में लेकर
नौकायन के लिए निकल गए !
पर मैं उस वक़्त घर पर नहीं था ।

लेकिन जब लौट कर घर आया
और अपनी पत्नी से ये सुना कि
बच्चे नाव लेकर नौकायन पर निकल
गए हैं, तो मैं बदहवास सा हो गया।

क्योंकि मुझे याद आया कि नाव में
तो छेद है ! मैं गिरता पड़ता भागा,
उस तरफ, जिधर मेरे प्यारे बच्चे गए थे,
लेकिन मुझे बच्चे सकुशल मिल गए।

तो मेरी ख़ुशी का आलम आप खुद
समझ सकते हो, मैंने छेद चेक किया,
तो पता चला कि, मुझे बिना बताये ही,
तुम उसे पहले ही रिपेयर कर चुके हो।

तो मेरे दोस्त उस महान कार्य के
लिए तो ये पैसे भी बहुत थोड़े हैं !
मेरी औकात नहीं कि उस कार्य के
बदले तुम्हे ठीक ठाक पैसे दे पाऊं !

भलाई का कार्य मौका मिलते ही
करते रहना चाहिए, भले छोटा सा
कार्य ही क्यों न हो, छोटा सा कार्य
भी कभी बहुत अमूल्य हो जाता है।

जिन्होने हमारे जीवन की नाव कभी
भी रिपेयर की, उन्हें हार्दिक धन्यवाद दें,
और आदित्य प्रयत्नशील रहें कि हम
किसी की जीवन नैय्या यूँ डूबने न दें।

डा० कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
लखनऊ

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